Well again, this is Sandesh Boss's Day.
we were just talking about our creation, I was telling him some of my old poems, them he wrote, following lines on me.
likhte likhe wo yun gazal hi ban gayi ....
Here I am sharing what he said about me.
नूर तुम जलाते रहे जिंदगी को यूँ ही,
ज़र्रे की तज्जली को वो एक शख्श समझ न पाया | [तज्जली = रौशनी]
अब तो ख्वाइश की वो रहे खुश हमेशा
कभी करेंगे हिसाब,की इश्क में क्या खोया.क्या पाया |
अपनी ख़ुशी को बेच दिया साकी के एक इशारे पर,
जाने इस रिंद को अब कौनसा नशा छाया | [रिंद = शराबी]
बहुत आंसा नहीं है इश्क में तड़पना भी,
मौला-ऐ-नूर ये हुनर तूने कहाँ से पाया |
हमने देखी है दिल की तड़पन उन निगाहों में,
वो खाक कहे,पर हमने सिर्फ उनमें प्यार पाया |
अब ना कुछ कहना,हमें आँखों को पढ़ने का हुनर है,
एक यही तो एहसास,तुम्हारे इतने करीब लाया |
Sunday, March 21, 2010
कौन इश्क समझ पाया
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