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Saturday, July 9, 2011

कुछ ख्वाब बुनता हूँ

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अब्र के साये में रह मैं बूंदों को तरसता हूँ
बेखबर दरिया पे बरसते बादल को देखता हूँ

खवाबों में उस हसीन के खवाब देखता हूँ ,
गुजरते पलों से दिली उम्मीदों को बुनता हूँ

Monday, May 23, 2011

मुझे आशिक बन जाने दो

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आखरी बार ही सही मुझे हार जाने दो
मर के जी जाने दो जीकर मर जाने दो

सिला-ऐ-इश्क हमें ही है चुकाना जानशीं
ना सोचो कुछ मुझे मुफलिस हो जाने दो

शायद ये अब्रे जुल्फ कभी ना बरसेगा 
पर उस आरज़ू में रूह तर कर जाने दो

Wednesday, March 2, 2011

कशमकश ऐ दीवानगी

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दीवानों सा गली गली उसका नाम यूँ पुकारता रहा
बेवज़ह ही मैं उसकी बदनामी का सबब बनता रहा

कहता रहा कि मोहब्बत है मुझे तुमसे बेइन्तेहाँ,
पर खुद ही क्यों अपने यार को रुसवा करता रहा

बस यूँ बिन सोचे जाने इकरारे इश्क किया मैंने,
कभी नहीं पूछा, क्यूँ तेरा दिल ऐसे जलता रहा

हो रहा है मुझे अब अपनी खताओं का एहसास,
किसी कोने में छुपकर कल रात भर मैं रोता रहा

Friday, February 25, 2011

सुलझा अनसुलझा सवाल

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सवाल हूँ कोई अनसुलझा सा, जवाब ढूँढता हूँ
या जवाब शायद ऐसा जो खुद से सवाल करता हूँ

कभी बहुत ख़ामोशी से मैं खुद से भी पूछता हूँ
क्यूँ उसे ऐसे बेपरवाह बेपनाह मोहब्बत करता हूँ

सवाल है कि जो मैं करता हूँ वो क्यूँ करता हूँ,
क्या ये मैं सही करता हूँ या फिर गलत करता हूँ

Sunday, January 23, 2011

कभी यूँ हुआ भी होता

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कभी मै के नशे का खुमार उतरा भी होता
लाख कोशिश की पर मैं उसको भूला भी होता

दूर रह कर जिस्म में साँसें ले रहा उसका प्यार
मैंने कभी उसको यादों से अलग किया भी होता

जिस पर निसार किया मैंने ये दिलो जाँ,
कभी तो उसकी जुबां से इकरार सुना भी होता

Saturday, December 25, 2010

देना ही है अगर

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मेरे सामने हमेशा रास्ता-ऐ-उल्फत रहा
शूल काँटें मेरी आहें अब और ना सता

गर जिल्लत ही देनी है मौला तो दे दे
रहम कर इज्जत के अलफ़ाज़ ना सुना

मौत ही बक्शी है जो तूने दर्दनाक तो
बहारे जिंदगी की झूठी राहें ना दिखा

Monday, December 13, 2010

तेरा मेरा कल, तेरा मेरा आज

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तुझसे अलग मैं, मुझसे तू थोड़ा दूर ज़रा था
खता ना तेरी ना मेरी, वक्त ही अलग सा था

था इश्क तेरे दिल में, और मेरे दिल में भी,
छाया था जो हम पर वो अब्र बदगुमानी का था

कड़कती बिजलियाँ, कहीं थी तेज आंधियाँ,
तेजाबी बारिश में कहीं कहीं दिल भी जला था

Thursday, September 9, 2010

तुझसे मोहब्बत है

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यूँ तो क्या था मैं, सिर्फ ज़र्रा ऐ ज़मीन,
खुद से पहचान, तेरे प्यार में खोकर किया हूँ |

सावन कितने आये जिंदगी में, रहा सहरा में,
तेरी मोहब्बत के सहारे, खुद को तर किया हूँ |

यूँ ठुकराया मुझको इस जहान ने, गम नहीं,
एक तेरे आगोशे मोहब्बत में, बसर किया हूँ |

सब दुःख तकलीफ,गम से तू दूर रहे,
ये दुआ मांगता हूँ,हर पल यही चाहत किया हूँ |

तेरे चेहरे पर हंसी खेलती रहे हमेशा,
खुद को फना, तेरी हंसी के दीदार पर किया हूँ |

Monday, August 30, 2010

देश परदेश - अपने पराये

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परदेस में बैठ कर, मेरा देश और अपना लगता है,
कभी सपनों को पूरा करना भी, एक सपना लगता है |

आये इतनी दूर यहाँ, कागज के टुकड़ों के खातिर,
खुद का जीवन, अब शाख से टूटा एक पत्ता लगता है |

खुद की आस, खुद की प्यास ना जाने कहाँ खो गयी,
चंद सिक्कों की भूख का असर दिल पे छाया लगता है |

Thursday, March 25, 2010

यूँ किसको मोहब्बत करते हो

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खुदा मान उसको यूँ सजदा करते हो,
सूनी ज़िन्दगी में किसे ढूँढा करते हो |

बस यादों के साए हैं जहाँ,
तुम उनमें घूमा करते हो |

कोई राज़ नहीं छुपा है इन आँखों में,
तुम उनमें क्या देखा करते हो |

Sunday, March 21, 2010

कौन इश्क समझ पाया

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Well again, this is Sandesh Boss's Day.
we were just talking about our creation, I was telling him some of my old poems, them he wrote, following lines on me.
likhte likhe wo yun gazal hi ban gayi ....
Here I am sharing what he said about me.

नूर तुम जलाते रहे जिंदगी को यूँ ही,
ज़र्रे की तज्जली को वो एक शख्श समझ न पाया | [तज्जली = रौशनी]

अब तो ख्वाइश की वो रहे खुश हमेशा
कभी करेंगे हिसाब,की इश्क में क्या खोया.क्या पाया |

अपनी ख़ुशी को बेच दिया साकी के एक इशारे पर,
जाने इस रिंद को अब कौनसा नशा छाया | [रिंद = शराबी]

तू गर हमसफ़र भी होता तो क्या होता

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Well This is Sandesh Boss's Creation,
My College Senior, My Dronacharya, My best Buddy.
I am gr8 fan of him, I don't how, but He wrote my heart.

वो अगर आज ये ना लिखते, तो शायद कुछ सालों बाद यही poem mere Blog par होती, meri kavita ke रूप में, hehehehehehe.
Boss you have written a master piece, Hats off to you.

आतिश-ऐ-इश्क में जलना था मुझे अकेला,तू गर साथ भी होता तो क्या होता
जब मरना ही था मुझे प्यासा, तो तू समुंदर भी होता तो क्या होता

दिल से निकले पाक-ऐ-अश्क को भी तुने जो बहाना माना
यकीं तुझे मुझ पर इतना तो फिर वो लहू भी होता तो क्या होता

Gain a pain, and walk in the Rain

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I always heard, when
they say we love to walk in rain.

I asked myself, why they say so,
but all my efforts were in vain.

today when I lost someone ,
when I am in so much pain.

understood, that was not a tale,
or a cakewalk,to walk in the rain .

Saturday, March 20, 2010

उल्फ़त की उलझन

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लड़ रहा हूँ ना जाने किस से, जब रणभूमि है सुनसान,
कुछ भी नहीं वहाँ, बस है एक खाली मैदान |

कोई नहीं है, कोई जो दे शाह या मात,
फिर क्यों लगे है, युद्ध यहाँ चढ़ा है परवान |

पूछूं किस से, मेरे दिल में भी कुछ सवाल हैं,
जिन्होंने मचाया है, मेरे तसूव्वर में तूफान |

कौन जाने कौन है साथ, कौन छोड़ देगा साथ,
उनके जाने का डर है साथ, चाहे मान ना मान |